ऐ नींद, तुझे मुझसे दुश्मनी क्यो है ,
जब चाहता हु ,आती नही तू
जब ना चाहु , गले लगाती तू
याद नही क्या
सपने पहले भी थे , आज भी है
पहले उन्ही सपनो में खो के
सोना अच्छा लगता था
आज वही सपने सोने नही देते है
तब तो मैं चलना सीखा भी नहीं था
फिर भी तू मेरे साथ गुजरा करता था
ढेरो वक़्त
आज तो मैं दौड़ता भी हु ,
फिर भी क्यो तू रुका हुआ है
आ फिर से चले उसी दुनिया मे
जहा तुझे मैं याद करू और तू सिर्फ मुझे
जहा हमारे बीच कोई ना हो
और फिर एक बार सपने में खो के
सो जाऊ
ए नींद एक बार फिर आजा तू!
सुंदर👌
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आभार आपका!
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सपने पहले भी थे , आज भी है
पहले उन्ही सपनो में खो के
सोना अच्छा लगता था
आज वही सपने सोने नही देते है
खूबसूरत पंक्तियाँ।
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शुक्रिया !
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