गुफ्तगू- गन्ने वाले भैया से


मै- अरे भैया, आप इधर। गया तो रेड ज़ोन में है और सरकार ने तो फेरी लगाने से मना किया है। आपने न्यूज नहीं सुना क्या?

भैया- क्या करे साहब। सरकार इस पापी पेट को तो नहीं बंद कर सकती ना। गन्ने का रस नहीं बिकेगा तो मै खाऊंगा क्या?

मै- बात तो सही कह रहे हो। भला बुख को भोजन के सिवाए कौन शांत करा सकता है। तो क्या आपको गन्ने के रस का खरीदार मिल जाते है? जहा देखो वहां खाली पड़ा है।

भैया- अगर यही सोच कर मैं घर से ना निकलू तो मेरे परिवार का क्या होगा? पब्लिक तो कम गई है। ज्यादातर दुकान वाले ही लेके पीते है क्योंकि होटल बंद है और उनका दोपहर का खाना यही हो जाता है।

मै- वो तो ठीक है भैया पर आपको प्रशाशन से दर नहीं लगता है? कहीं वसूली कर ली उन्होंने तो? भैया- क्या वसूली करेंगे साहब। २-४ डंडे खा लूंगा और बोल दूंगा पैसे नहीं है। अब जो २००-२५० कमाता हूं वो दे तो सकता नहीं।

मै- अच्छा ये बताओ ये गन्ने अपने खेत से ला रहे हो? भैया- नहीं भैया। अपना तो छोटा सा खेत है जिसमें पालक- धनिया और कुछ खीरा हो जाता है बच्चों के लिए। इतनी पूंजी भी कहा है जो गन्ने की खेती कर सकू?

मै- ओह। एक गिलास गन्ने के रस पे कितना कमा लेते हो, भैया? भैया- क्या ही कमाऊंगा भैया। आप देख ही रहे हो कि गन्ने से जूस निकालने के लिए मोटर रखे है। जिस गाड़ी से चल रही हूं वो भी डीजल की है। ऐसे में एक ग्लास पे ३-४ रुपए बचते है।

मै- मेहनत ज्यादा है और आमदनी काम। अच्छा ये बताओ तुम्हे इस वायरस से डर नहीं लगता जो इस तरह घूम घूम कर गन्ने का रस बेच रहे? भैया- अगर डर लग जाएगा भैया तो कोरोना वायरस से पहले भूख से मर जाऊंगा। मै- गंभीर स्थिति है। सरकार से कोई मांग?

भैया- हम छोटे लोग क्या मांग सकते है भैया। बस मेहनत से दे सकते है। अब भगवान से यही इच्छा है कि सब कुछ पहले जैसा हो जाए।

मै- हम सब की भी इच्छा है। एक बड़ी वाली ग्लास बना देना जरा, और नींबू ज्यादा डालना। भैया- जी भैया। अभी देता हूं।।

– शशांक

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